Sunday, March 25, 2012

श्री हनुमान चालीसा

                        (   दोहा )
श्री गुरु चरन सरोज रज,निज मनु मुकुर सुधारी।
बरनऊ रघुवर विमल जसु जो दायक फल चारी ।।
बुद्धि हिन् तनु जानिके ,सुमिरो पवन कुमार ।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि ,हरहु कलेश विकार ।
                         (चोपाई )                             
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर   ।
जय कपीस तिहु लोक उजागर ।।
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनी पुत्र पवन सूत नामा।।
महावीर विक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुंडल कुंचित केसा ।।
\हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे ।
कंधे  मुंज  जनेऊ  साजे।।
संकर सुवन केसरी नंदन ।
तेज प्रताप महा जग  वंदन ।।
विद्या वां गुणी आतिचतुर ।
राम काज करिबे को आतुर ।।
परभू चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ।।
शुछ्म रूप धरी सियहिदिखावा ।
विकट रूप धरी लंक जरावा ।।
भीम रूप धरी असुर संहारे \
राम चन्द्र के काज सवाँरे ।।
लाये संजीवन लखन जियाये ।
श्री रघुवर हरषि उर लाये ।।
रघुपति किन्ही बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतही सम भाई ।।
सहस बदन तुम्हारो जस गावे ।
अस कही श्री पति कंठ लगावे ।।
सनकादिक बह्रामादी मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहिसा ।।
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबिकोबिंद कही सके कहा ते ।।
तुम उपकार सुग्रीव ही कीन्हा ।
राम मिलाये राज पद दीन्हा ।।
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना ।
लंकेश्वर भये सब जग जाना ।।
जुग सहस्त्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहि ।
जलधि लांध गए अचरज नाही ।।
दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम काज जगत  के तेते ।।
राम दुवारे तुम रखवाले ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।।
सब सुख लहे तुम्हारी सरना ।
तुम रछक कहू को डरना ।।
आपन तेज सम्हारो आपे  \
तीनो लोक हांकते कांपे ।।
भुत पिसाच निकट नहीं आवे ।
महावीर जब नाम सुनावे ।।
नासे रोग हरे सब पीरा  ।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ।।
संकट ते हनुमान छुडावे ।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावे ।।
सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावे ।
सोई अमित जीवन फल पावे ।।
चारो जुग परताप तुम्हारा  ।
हे प्रसिद्ध जगत उजियारा ।।
साधू  संत के तुम रखवारे ।
असुर निकंदन राम दुलारे ।।
अष्ट शिद्धि  नो निधि के दाता ।
अस बर दिन  जानकी माता  ।।
राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सदा  रहो रघुपति   के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को पावे ।
जनम जनम के दुख बिसरावे ।।
अंत काल रघुवर पुर जाई  ।
जहा जनम हरी भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरिइ ।
हनुमत सेई सर्व सुख कराइ ।।
संकट कटे मिटे सब पीरा   ।
जो सुमिरे हनुमत बल वीरा ।।
जय जय जय हनुमान गोसाई ।
करपा करहु गुरु देव की नाई।।
जो सत बार पाठ कर कोई ।
छुटही बंदी महा सुख होई ।।
जो पड़े हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गोरिसा ।।
तुलसी दास सदा हरी चेरा ।
कीजे नाथ ह्रदय माह डेरा ।।
   दोहा
पवन तनय संकट हरण ,मंगल मूर्ति रूप ।
राम लखन सीता सहित ह्रदय बसहु सुर भूप  ।।

              ।।इति ।। 

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