आज से ईसा के ६०० वर्ष पूर्व ६वि शताब्दी में भारत में हिंसा , असत्य अनाचार ,शोषण का बोल बाला था इसे समय में भारत की विशाल नगरी वैशाली में पाप को हल्का करने का प्रयास किया गया .उन दिनों वैशाली में ,चेटक,नाम के राजा का शासन था चेटक की रूपवती पुत्रियों में से एक का नाम त्रिशला था त्रिशला का विवाह कुण्डलपुर के शासक राजा सिद्धार्थ से हुआ था एक दिन रानी त्रिशला अपने राज भवन में निंद्रा लीन थी तब रात्रि के अंतिम पहर में रानी को सोलह स्वप्नदिखाई दिए . इन स्वप्न को देख त्रिशला की नींद खुल गयी .वे सोचने लगी की एसा तो कभी नहीं हुआ ?प्रात:काल रात्रि के स्वप्न के विषय में राजा सिद्धार्थ ने सुना तो -वह भाव विभोर हो कहने लगे इस घर में महान विभूति का अवतार होने वाला है .हे त्रिशिले तुम बहुत भाग्य शाली हो नो मास की समाप्ति पर चेत्र शुक्ल त्रयोदशी के शुभ दिन वैशाली के कुंडलपुर ग्राम में रानी त्रिशला ने एक विभूति को जन्म दिया जिसने आगे चलकर विश्व धर्म की स्थापना की हिंसा को पराजित किया असत्य और अन्याय को हराया .ये विभूति थे -भगवान महावीर स्वामी .इनके जीवन की पञ्च स्थितिया -गर्भ ,जन्म , तप, घ्यान ,और निर्वाण आदि .पञ्च कल्याणक से जानी जाती है ...
Wednesday, April 4, 2012
जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर स्वामी
Saturday, March 31, 2012
विचार
जिस व्यक्ति के मन में जेसे भाव होंगे उसके विचार भी वेसे ही प्रकट होते हे .जो मन के भीतर चलता हे वही बहार दिखाई पड़ता है उसी प्रकार हम जो लोगो को देते है वही हमे मिलता है इस संसार में केवल सुकून की तलाश मै घुमाने वालो को कभी सुख शांति नहीं मिल पाती .जिसके भाग्य में जो लिखा उससे ज्यादा उसे नहीं मिलने वाला है कोई चाहे कितना भी प्रयास करले,भाग्य के लेख को नही बदला जा सकता .किसी को दुखी देखकर अगर मन मै दया भाव आ जाये तो समझ लेना चाहिए की वह सच्चा उपासक है ...
Tuesday, March 27, 2012
सु वचन
दिया हुआ कभी व्यर्थ नहीं जाता :कहा जाता हे की ,जो दिया जाता है वह सोना हो जाता है जो रख लिया जाता हे वह मिट्टी हो जाता है .दिया जाना ही ले जाने का मार्ग है जो हाथो से से कमाओगे वाही तुम्हारा है मरने के बाद लोग ,रिश्ते नाते दार आत्मा की शांति के लिए भगवन से प्रार्थना करेगे लेकिन यह सब तुम्हारे किसी काम की नहीं .जोपरार्थ्ना होंश में करोगे वाही तुम्हारे काम में आएगी .
जीवन में परमात्मा व् मर्त्यु को सदा याद रखो बस भूलो तो अपने साथ किये गए व्यवहार को किसी ने तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार किया तो उसे दिल में गांठ बांध कर मत रखो ,इससे बदले की भावना जागे गी किसी का भला किया तो भूल जाओ वर्ना अहंकार आएगा आज कल लोग भूलने वाली बाते याद रखते हे और याद रखने वाली बाते भूल जाते हे दान का प्रदर्शन मत कीजिये :दान व् स्नान गुप्त होना चाहिए .दान करते समय बच्चे का हाथ भी लगाइए ताकि उसे भी दान का संस्कार पड़े मंदिर पैदल जाइये सुख सुविधा छोड़ कर जाइये इससे परभू की कृपा अवश्य प्राप्त होगी .
" मुनिश्री "
Sunday, March 25, 2012
श्री हनुमान चालीसा
( दोहा )
श्री गुरु चरन सरोज रज,निज मनु मुकुर सुधारी।
बरनऊ रघुवर विमल जसु जो दायक फल चारी ।।
बुद्धि हिन् तनु जानिके ,सुमिरो पवन कुमार ।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि ,हरहु कलेश विकार ।
(चोपाई )
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ।
जय कपीस तिहु लोक उजागर ।।
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनी पुत्र पवन सूत नामा।।
महावीर विक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुंडल कुंचित केसा ।।
\हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे ।
कंधे मुंज जनेऊ साजे।।
संकर सुवन केसरी नंदन ।
तेज प्रताप महा जग वंदन ।।
विद्या वां गुणी आतिचतुर ।
राम काज करिबे को आतुर ।।
परभू चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ।।
शुछ्म रूप धरी सियहिदिखावा ।
विकट रूप धरी लंक जरावा ।।
भीम रूप धरी असुर संहारे \
राम चन्द्र के काज सवाँरे ।।
लाये संजीवन लखन जियाये ।
श्री रघुवर हरषि उर लाये ।।
रघुपति किन्ही बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतही सम भाई ।।
सहस बदन तुम्हारो जस गावे ।
अस कही श्री पति कंठ लगावे ।।
सनकादिक बह्रामादी मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहिसा ।।
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबिकोबिंद कही सके कहा ते ।।
तुम उपकार सुग्रीव ही कीन्हा ।
राम मिलाये राज पद दीन्हा ।।
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना ।
लंकेश्वर भये सब जग जाना ।।
जुग सहस्त्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहि ।
जलधि लांध गए अचरज नाही ।।
दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम काज जगत के तेते ।।
राम दुवारे तुम रखवाले ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।।
सब सुख लहे तुम्हारी सरना ।
तुम रछक कहू को डरना ।।
आपन तेज सम्हारो आपे \
तीनो लोक हांकते कांपे ।।
भुत पिसाच निकट नहीं आवे ।
महावीर जब नाम सुनावे ।।
नासे रोग हरे सब पीरा ।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ।।
संकट ते हनुमान छुडावे ।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावे ।।
सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावे ।
सोई अमित जीवन फल पावे ।।
चारो जुग परताप तुम्हारा ।
हे प्रसिद्ध जगत उजियारा ।।
साधू संत के तुम रखवारे ।
असुर निकंदन राम दुलारे ।।
अष्ट शिद्धि नो निधि के दाता ।
अस बर दिन जानकी माता ।।
राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को पावे ।
जनम जनम के दुख बिसरावे ।।
अंत काल रघुवर पुर जाई ।
जहा जनम हरी भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरिइ ।
हनुमत सेई सर्व सुख कराइ ।।
संकट कटे मिटे सब पीरा ।
जो सुमिरे हनुमत बल वीरा ।।
जय जय जय हनुमान गोसाई ।
करपा करहु गुरु देव की नाई।।
जो सत बार पाठ कर कोई ।
छुटही बंदी महा सुख होई ।।
जो पड़े हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गोरिसा ।।
तुलसी दास सदा हरी चेरा ।
कीजे नाथ ह्रदय माह डेरा ।।
दोहा
पवन तनय संकट हरण ,मंगल मूर्ति रूप ।
राम लखन सीता सहित ह्रदय बसहु सुर भूप ।।
।।इति ।।
श्री गुरु चरन सरोज रज,निज मनु मुकुर सुधारी।
बरनऊ रघुवर विमल जसु जो दायक फल चारी ।।
बुद्धि हिन् तनु जानिके ,सुमिरो पवन कुमार ।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि ,हरहु कलेश विकार ।
(चोपाई )
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ।
जय कपीस तिहु लोक उजागर ।।
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनी पुत्र पवन सूत नामा।।
महावीर विक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुंडल कुंचित केसा ।।
\हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे ।
कंधे मुंज जनेऊ साजे।।
संकर सुवन केसरी नंदन ।
तेज प्रताप महा जग वंदन ।।
विद्या वां गुणी आतिचतुर ।
राम काज करिबे को आतुर ।।
परभू चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ।।
शुछ्म रूप धरी सियहिदिखावा ।
विकट रूप धरी लंक जरावा ।।
भीम रूप धरी असुर संहारे \
राम चन्द्र के काज सवाँरे ।।
लाये संजीवन लखन जियाये ।
श्री रघुवर हरषि उर लाये ।।
रघुपति किन्ही बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतही सम भाई ।।
सहस बदन तुम्हारो जस गावे ।
अस कही श्री पति कंठ लगावे ।।
सनकादिक बह्रामादी मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहिसा ।।
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबिकोबिंद कही सके कहा ते ।।
तुम उपकार सुग्रीव ही कीन्हा ।
राम मिलाये राज पद दीन्हा ।।
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना ।
लंकेश्वर भये सब जग जाना ।।
जुग सहस्त्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहि ।
जलधि लांध गए अचरज नाही ।।
दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम काज जगत के तेते ।।
राम दुवारे तुम रखवाले ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।।
सब सुख लहे तुम्हारी सरना ।
तुम रछक कहू को डरना ।।
आपन तेज सम्हारो आपे \
तीनो लोक हांकते कांपे ।।
भुत पिसाच निकट नहीं आवे ।
महावीर जब नाम सुनावे ।।
नासे रोग हरे सब पीरा ।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ।।
संकट ते हनुमान छुडावे ।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावे ।।
सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावे ।
सोई अमित जीवन फल पावे ।।
चारो जुग परताप तुम्हारा ।
हे प्रसिद्ध जगत उजियारा ।।
साधू संत के तुम रखवारे ।
असुर निकंदन राम दुलारे ।।
अष्ट शिद्धि नो निधि के दाता ।
अस बर दिन जानकी माता ।।
राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को पावे ।
जनम जनम के दुख बिसरावे ।।
अंत काल रघुवर पुर जाई ।
जहा जनम हरी भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरिइ ।
हनुमत सेई सर्व सुख कराइ ।।
संकट कटे मिटे सब पीरा ।
जो सुमिरे हनुमत बल वीरा ।।
जय जय जय हनुमान गोसाई ।
करपा करहु गुरु देव की नाई।।
जो सत बार पाठ कर कोई ।
छुटही बंदी महा सुख होई ।।
जो पड़े हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गोरिसा ।।
तुलसी दास सदा हरी चेरा ।
कीजे नाथ ह्रदय माह डेरा ।।
दोहा
पवन तनय संकट हरण ,मंगल मूर्ति रूप ।
राम लखन सीता सहित ह्रदय बसहु सुर भूप ।।
।।इति ।।
Saturday, March 24, 2012
धड़कन
दिल की धड़कन
तेरी पलको की चमक में उमड़ी
देर तक राज रहे राज
राज तो खुल जाता हे
अपनी किरणों को
समेटे हुए हंगामे -सफ़र
चाँद शबनम में उतरता है
तो ढल जाता है
तेरी पलको की चमक में उमड़ी
देर तक राज रहे राज
राज तो खुल जाता हे
अपनी किरणों को
समेटे हुए हंगामे -सफ़र
चाँद शबनम में उतरता है
तो ढल जाता है
Monday, March 19, 2012
स्वभाव
योग्यता का कोई पद नही है ,स्वभाव है
लाओत्से का यह सूत्र इससंदर्भ में समझे ।
योग्यता को हम पद क्यों बनाये ?योग्यता को स्वभाव क्यों न माने!
इस फर्क को समझ लेना चाहिए ,इस फर्क पर बड़ी बाते निर्भर होगी ।योग्यता को हम स्वभाव क्यों न माने !
योग्यता को हम पद क्यों बनाये ?एक आदमी गणित में कुशल है ,यह उसका स्वभाव है और एक आदमी संगीत
में कुशल है यह उसका स्वभाव है ।और एक आदमी गणित में कमजोर है यह कमजोरी उसका स्वभाव है ।
जो गणित मै कुशल है उसकी कोइ खूबी नहीं ,क्योकि गणित कुशलता उसे प्रकृति से मिलती है और गणित में
कमजोर है उसका दुर्गुण नहीं ,क्योकि गणित की यह अकुशलता उसे उसी तरह प्रकृति से मिलती है जेसे कुशलता
वाले को कुशलता मिलती है हम चूंकिइस प्रकृति को स्वीकार नही कर पातेऔर एक के साथ पद मर्यादा जोड़ देते हे
और दुसरे के साथ पद हीनता जोड़ देते है तो हम विग्रह और कलह और संघर्ष को जन्म देते है ।इसका अर्थ यह हुआ की हम कभी यह नहीं देख पाते की प्राकर्तिक क्या है स्व,भाव क्या है ।
लाओत्से का यह सूत्र इससंदर्भ में समझे ।
योग्यता को हम पद क्यों बनाये ?योग्यता को स्वभाव क्यों न माने!
इस फर्क को समझ लेना चाहिए ,इस फर्क पर बड़ी बाते निर्भर होगी ।योग्यता को हम स्वभाव क्यों न माने !
योग्यता को हम पद क्यों बनाये ?एक आदमी गणित में कुशल है ,यह उसका स्वभाव है और एक आदमी संगीत
में कुशल है यह उसका स्वभाव है ।और एक आदमी गणित में कमजोर है यह कमजोरी उसका स्वभाव है ।
जो गणित मै कुशल है उसकी कोइ खूबी नहीं ,क्योकि गणित कुशलता उसे प्रकृति से मिलती है और गणित में
कमजोर है उसका दुर्गुण नहीं ,क्योकि गणित की यह अकुशलता उसे उसी तरह प्रकृति से मिलती है जेसे कुशलता
वाले को कुशलता मिलती है हम चूंकिइस प्रकृति को स्वीकार नही कर पातेऔर एक के साथ पद मर्यादा जोड़ देते हे
और दुसरे के साथ पद हीनता जोड़ देते है तो हम विग्रह और कलह और संघर्ष को जन्म देते है ।इसका अर्थ यह हुआ की हम कभी यह नहीं देख पाते की प्राकर्तिक क्या है स्व,भाव क्या है ।
इच्छा शक्ति
प्रतियेक व्यक्ति सुख _एश्वर्य ,धन संपदा एवं निरोगी काया चाहता है इ उसकी एक कमाना पूरी होती है तो ,वह दूसरी कामना की और बढ जाता है इस प्रकार कामनाओ अर्थात इच्छाओ का कोई अंत नहीं ,किन्तु किसी इच्छा करने मात्र का नाम ही इच्छा शक्ति नही है ।इच्छा तो प्रतियेक व्यक्ति करता है -किन्तु उसकी पूर्ति करने के लिए कठोर परिश्रम आवश्यक होता है संकल्प आवश्यक होता है तभी इच्छा पूर्ति संभव होती है
धार्मिक इतिहास
आपको पता होगा की धार्मिक इतिहास में सेकड़ो उदाहरण है ,जब की पापी पल भर में पुण्य आत्मा हो गये है ।
इसका कुल कारन इतना हे की शक्तिया बहुत थी केवल ट्रांसफ़ोर्ममेशन रूपांतरण की बात थी शुभ सम्पर्क चाहिए
और सब बदल जायेगा ।अंगुलिमाल ने बहुत हत्याए की उसने एक हजार लोगो की हत्या करने का व्रत लिया था
उसने नो सो निन्यानवे लोगो की हत्या करके उनकी उंगलियों की माला पहन ली थी उसे आखरी आदमी चाहिए था बुद्ध उस रस्ते निकले जहा अंगुलिमाल रहता था गाव के लोगो ने कहा उधर मत जाइये आप निहत्ते भिक्षु है अंगुलिमाल आप की हत्या कर देगा बुद्ध ने कहा ,हम तो जो रास्ता चुनते हे उस पर चलते हे किसी कीवजह से
रास्ता नही बदलते और अगर अंगुलिमाल यहाँ है तो हमारी और भी जरुरत हो गयी है ।अब देखना यह है की वह
हमे मारता हे की हम उसको मारते हे अंगुलिमाल ने टेकडी नजर से देखा की एक निहत्ता भिक्षु _शांत _रस्ते -पर चला आ रहा हे उसने वही चिल्ला कर कहा देखो यहाँ मत आओ ।सिर्फ इसलिए कह रहा हु की तुम सन्यासी हो वापस लोट जाओ ।क्योकि हम किसी पर दया करने के आदि नहीं है बुद्ध ने कहा हम भी किसी की दया लेने के
आदि नहीं हे और जहा चुनोती हो वहा सन्यासी केसे पीछे लोटेगा ?अंगुलिमाल बहुत हैरान हुआ की यह आदमी तो पागल लगता हे उसने अपना फरशाउठाया और निचे उतरा तो बुद्ध ने उसे कहा इसके पहले की तुम मुझे मारोंएक छोटा सा कम करो यह सामने पैड हे उस पैड के चार पत्ते तोड़ दो उसने फरसे से मारा और डाल तोड़ दी और कहायह रहा चार के बदले चार हजार बुद्ध ने कहा अब एक छोटा और काम और करो ।इसके पहले की तुम
मुझे मारो ,इन पत्तियों को वापस इसी दरख़्त में जोड़ दो । अंगुलिमाल बोला यह यह मुश्किल है तो बुद्ध ने कहा तोड़ना तो बच्चा भी कर सकता हे जोड़ना जो करे उसमे ही पुरुष हे इसमे ही पुरषार्थ है तुम कजोर आदमी हो ।तुम यह ख्याल छोड़ दो की तुम शक्ति शाली हो उसने एक पल गोर से सोचा फिर कहा ,यह सही हे ।क्या पत्ता जोड़ने कोई रास्ता हो सकता है बुद्ध ने कहा हम उसी रास्ते पर चल रहे है और उसके स्वाभिमान को पहली दफे यह पता चला की मारने का कोई मतलब नहीं है में क्या करू ? बुद्ध ने कहा मेरे पीछे आओ ।अंगुलिमाल उस दिन भिक्षु हो गया I
मुझे मारो ,इन पत्तियों को वापस इसी दरख़्त में जोड़ दो । अंगुलिमाल बोला यह यह मुश्किल है तो बुद्ध ने कहा तोड़ना तो बच्चा भी कर सकता हे जोड़ना जो करे उसमे ही पुरुष हे इसमे ही पुरषार्थ है तुम कजोर आदमी हो ।तुम यह ख्याल छोड़ दो की तुम शक्ति शाली हो उसने एक पल गोर से सोचा फिर कहा ,यह सही हे ।क्या पत्ता जोड़ने कोई रास्ता हो सकता है बुद्ध ने कहा हम उसी रास्ते पर चल रहे है और उसके स्वाभिमान को पहली दफे यह पता चला की मारने का कोई मतलब नहीं है में क्या करू ? बुद्ध ने कहा मेरे पीछे आओ ।अंगुलिमाल उस दिन भिक्षु हो गया I
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